प्राइमरी से पीएचडी तक:
प्राइमरी से पीएचडी तक: एक विश्लेषण
हजरत हुसैन (रजि.) की शहादत के बाद, 'अरब साम्राज्यवाद' (Arab Imperialism) ने इस्लाम का गला घोंट दिया। इसके बाद साम्राज्यवाद पर साम्राज्यवाद का नंगा नाच चलता रहा।
हम रीढ़विहीन मुसलमानों ने इस्लाम को छोटा और बौना करते-करते केवल 'पूजा-पाठ' वाला मजहब बना कर रख दिया है। जब भी कोई बौद्धिक (Intellectual) या विशुद्ध रूप से कुरआन और 'सीरत' की बात करता है, तो मजहबी लोग भड़क जाते हैं।
कलमा, नमाज, जकात, रोजा और हज—यह सब पूरे इस्लाम का 'प्राइमरी स्कूल' है।
* सहाबा का उदाहरण: सहाबा ने अपनी यात्रा प्राइमरी (इन बुनियादी स्तंभों) से शुरू की और सामाजिक व आर्थिक न्याय (Social and Economic Justice) की 'पीएचडी' पूरी करके दुनिया से रुखसत हुए।
* हमारी स्थिति: हम पिछले 1400 सालों से केवल प्राइमरी पास करके ही खुश हैं। प्राइमरी से आगे सोचना भी मानो गुनाह समझा जाता है।
* हमारा भ्रम: हमने मान लिया है कि प्राइमरी पास कर ली तो जन्नत में महल बन गया, और हम अपने इसी कुएं में खुश हैं। हमारे लिए बाकी दुनिया 'जाहिल' और 'जहन्नुमी' है।
मुसलमान पिछले 1400 वर्षों से इसी भ्रमपूर्ण स्थिति (Delusional Condition) में जी रहा है। जिस किसी ने भी प्राइमरी के आगे पढ़ने या बढ़ने की बात की, उसे 'काफिर' और 'जहन्नुमी' करार दे दिया गया।
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